Saturday, November 15, 2014

Yu kuch katre roshni ke chod aye the hum
Tumhare ghar ke kisi kone me ,, chipakar…..
Mujhe maloom hai
In beete salo ne
Thode badle hai mausam is baar tumhare liye
Par nayi dhoop chubti hogi kabhi
To unhe dhoondh lena,,,
Ye roshni hai isme ujala hai , tapish nhi
woh baarish ka halke se boondh ban itraana, woh hawa ka apne joko par khud rijh janna, kisi samandar par abhi yu lehre itrayi, ye mausam ne phir jo lee angrai

Intzaar

tum ana aur barasna mere nayno kii chat par, paudhe prem ke sajaye hai maine waha..
khwabo ki chaadar odi hai , aur halke se rakha hai haath mez par, tum ana to choo lena un haatho ko, mehnedi kii khusboo se sajaya rakha hai maine unhe ab tak..
darwajo ko apne rango me rang rakha hai, aur chaukhate sajayi hai apne geeto se, tum ana to khatkhatana haule haule se, neendo ko chupchap takiye ke neeche jagaye rakha hai humne
ye sab sirf tumhare intzaar me....

Sunday, August 24, 2014

mai badalo ko thame dauri chali aongi, tum phoolo se saja lena chota sa aashiyana humara, sird mausamo me chunenge dhup ko uchi chotiyo par paharo kii, tum raat ko gungunana naam mera, ini anjaan benaam din aur raaato me saja lenge hum apne pyaar ko, jaise sajate hai gharoda apne ye panchiii aasmano se pare...

Saturday, August 23, 2014

Mujhe zinda hee rakh

girti uthti takdiro ke faisalo ki keemat mat pooch
ye zamane ke tarazoo hai isme milawate bhi bahut hai
ye dekh abhi baki hai lahu ke daurne ka shor
mujhe har haal me jinda hee rakh


abhi abhi kudh parchaiye ne poocha hai mujhse mere hone ka sabab
usne kuch poocha hai yahi kafi hai
hai baki abhi jeene ki thodi see tapish aur
is tapish is garmahat me thodi der aur mujhe jeenda hee rakh

Thehrenge in raasto ke beech kabhi uske kadam bhi
ye soch uni galiyo me ghar kiraye par basa rakha hai
abhi abhi to zikr mera hua hai shayad
kisi ne poocha hai purana naam jo mera
kisi na kisi darwaze ko khatkhatayenge ab woh shayad 
is umeed mai hee sahi par mujhe jinda hee rakh.

dikhti hai talash meri har arzoo me
kisi bikhre hue sawaal ki tarah
woh koi to hai jo sambhal raha hai 
kitaab me purane phoolo ko
ye phool mere haatho se bhi shayad guzre hai
ishq ki woh kitaab abhi bheji hee unhe,
ek panne ke pade jane tak
mujhe har haal me jinda hee rakh




Wednesday, March 13, 2013

प्यार


चलो किस्सा ये प्यार का यही निपटा ले
थोडा तुम्हारे हिस्से में रहा थोडा हम ले जायेंगे,

वोह जो गुनगुनाते थे तुम धीरे धीरे खामोश  सर्द रातो में
और मै देखती थी सितारों को खिड़की से अपनी
और जलाने लगती थी उनको तुम्हारे साथ होने पर
वोह ख़ामोशी  मै रख लेती हू उन सितारों की
तुम वो जलन  साथ ले लेना

तुम्हारे कंधे पर रखकर सर में अपना, ना जाने कितनी रातें सोयी हू
और तुम्हारा सहलाना मेरे बालो को अपनी उंगलियों से
मुझे एहसास वही दे देना ,
 तुम मेरी नींदों को रख लेना

तुम्हे  याद होगा, बेहिसाब निकल पड़ना पैदल अनजान राहो पर
कभी रौनक कभी खामोश से शहर
वो  बाजारों की दिन की हलचल तुम्हारी,
 मुझे तनहा रातो की सैर दे देना

प्यार की वो नज़र तुम्हारी मेरी मुस्कराहट  बनकर खिल जाती थी
बनकर शब्द वो नज़रे  तुम्हारी बाते बेहिसाब किया करती थी
उस नज़र की एक याद मुझे रखने दो
तुम मेरी मुस्कराहट  ताउम्र रख लेना

mai baaki hu kahi aaj bhi..




taalashe to ho mujhko har jagah
kahi apni saaso ko tatolkar dekha hai kabhi
mai  baaki hu kahi aaj bhi...

thodi  tere ghar par girti chandni me bikhri hu
thodi teri  chhat se dikhte sitaro me lipti hu
thodi tere aangan ki dhul me simti hu
thodi si  tere sheher se abhi abhi guzri hu,,

mere baare me kisse kahaniya karte hai log yaha
meri chittiyo ke gumnaam pato ko dhoonte hai aaj bhilog yaha
mere wajood ko baatkar ayi hu apne kuch logo me
mujhe khatm yu na samjho
mai  baaki hu kahi aaj bhi...........

jab kabhi mere kamre kii talashi lena

Kyu aaj


Kyu aaj phir yeh ehsaas hua
Mai tanha tha aur tanha reh gya
Uske shokh khwabo me siskana chod diya tha
aaj palke bhi nam hai naa jane kiska maatam hai
chune hue phool mere guldaste kii raunak the
usi  mez par sapno ko bhi rakh choda tha
mallom uski keemat tab na thee
who pholo ka mausam tha, use beete arsaa hua
Kyu aaj phir yeh ehsaas hua
Mai tanha tha aur tanha reh gya
Jhote waayde na jaane kis chandi ke warq se saajaye the
Woh chamakte bhi the aur beswad bhi
Kisi roshandaan se chupkar jo dekha humne
Woh jashn  me hum sirf mehmaan the, use jeete arsaa hua
Bojh dil pe jo rakhte to tumse keh na paate
Hum pigalte hai jaise mom kii koi gudiya
Banane me sadiya lagi fanna pal me ho gaye
Hum sajhte the kisi deewar par banke beshkeemati tasveer
Bazaar me utare to jaan gaye
Apna bhi koi mol bhav kare, aisa koi hai to kaha hai
Use mile arsaa hua

Monday, March 12, 2012

मिल जाते जो तुम उन दिनों

मिल जाते जो तुम उन दिनों
जब मै अपने पहलू में चाँद रखती थी
और सितारों को अपनी जुल्फों में सजाकर रखती थी
सोचो , प्यार अपना किसी सुहानी रात सा होता

मिल जाते जो तुम उन दिनों
जब में इतराकर हवा को कहती थी
तू चल किसी भी और, मेरा ठौर वही बन जायेगा
मेरे हाथो की लकीरे भी बातें करती थी मुझसे
सोचो , प्यार अपना किसी कहानी सा होता

तकदीर तो देखो मिले तो अब मिले जब
मैंने जान लिया जिंदगी ख्वाबो में नही जी जाती........................

Wednesday, July 6, 2011

सोचा है


मेरी नाराज़गी महज़ रूठने मनाने के लिए नही
ये तो मेरी ज़िन्दगी का अंदाज़ बाया करती है
कभी रुसवा ज़माना करता है कभी अपने किया करते है ...
सोचा है इस बार उस पुराने से संदूक में बंद कर लू
अपने ख्वाबो को, की ये उड़ न पाए
बहुत घायल से हो चुके है जब भी उड़ान भरी है दूसरो के आसमानों में...
मेरा ज़िक्र जब भी होता है, तमाशा अपने आप ही बन जाता है
बहुत लोग है ज़माने में, जिन्हें हसने का और कोई बहाना नही मिलता
सोचा है इस बार से मिलना भी छोड़ दू लोगो से
शायद मेरे नाम सा कोई आयर शख्स मिल जाये उन्हें..
ये गुज़र तो रही है धीमी धीमी रफ़्तार से ज़िन्दगी
सोचा है इस बार सासों के हिसाब में उलट फेर कर दू...

Saturday, April 2, 2011

मुझे रहने दो


मुझे रहने दो गुमनामी में
ये अँधेरे कभी उस उजाले से ज्यादा भाते है
जो उजाले साथ में लाते है शर्त , जागते रहने की....

मुझे खफा रहने दो
मनाने के झूठे बहानो से
ये टूटती उम्मीदों के सिलसिलो को बढ़ाते है....

किसको फ़िक्र है यहाँ जश्न की
हम तो हर नाकामयाबी में समझा लेते है
कुछ तो है जो सिर्फ अपना है
जिसे बाटना नही पड़ता,,,,,,

बदल रही है आरजू वक़्त के साथ
कभी जिद थी मुस्कुराने की
और आज जिद है महज़ जीने की .....

Saturday, January 15, 2011

कह देना


आज रौशनी से कह देना
की थोड़ी धीमी आँच में सिक कर आये,
जम चुके है मेरे एहसास बर्फ से
और आँखे ढूंढ रही है उस तपिश को,

कब का बंद हो चुका है वह सुराख़
जहाँ से टटोलती थी एक जोड़ीदार आंखे,
मेरी साँसों की हलचल को ,
उन आँखों से इतना कह देना
नए सुराख़ का कोई तो इंतजाम कर लें

बुलाया तो आज भी है
किसी ने जश्न में अपने
बस थोड़ी सी उलझन है
आज रंगत नही उस लिफाफे में पहली जैसे
और नाम मेरा जैसे जल्दबाजी में लिखा है

मिले वह लोग तो इतना कह देना
न बुलाओगे तो भी इससे बेहतर होगा
मुझे अब भीड़ से डर लगने लगा है

Tuesday, January 4, 2011

नाम


तुम मुझे दो कुछ नाम और
देखो मै वही बन जाऊंगी
ख्वाब कहोगे तो तुम्हारी पलकों की
थिरकन पर बिखरूंगी सवरूंगी
थोडा इतराते हुए और मुस्कुराते हुए
चुपचाप तुम्हारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन ही जाऊंगी
और जो कह दोंगे मुझे
मै कोई हकीक़त कडवी सी,
तो भी क्या
बस यू ही एक अनजान की तरह
छोड़ जाऊंगी तुमको,
वही से जहा से तुम इशारा कर दोगे जाने का
ग़ज़ल गीत जो कह दोगे
तो शब्दों को अपने आगोश में यू ले लुंगी
जो मेरी शक्शियत का आईना बन जाए और
गुनगुनाते रहे तुम्हारे लब जिन्हें हमेशा
और जो कुछ नाम न भी दोगे तो कोई शिकायत नही
मुझे पता है ये
नाम उन्हें दिए जाते है जिन्हें किसी एक शब्द में तराशा जा सके
मैंने तो हर पल में बदला है अपना मिजाज़ तुम्हारे लिए

Thursday, December 30, 2010

आज जाने क्यूँ


आज जाने क्यूँ नमी कुछ ज्यादा सी लगी आँखों की समंदर में
क्यूँ आज भीगी भीगी पलके दिन भर बारिश का सा एहसास दिलाती रही
और यु ही धीमी मुस्कराहट खुद को समटने की कोशिश में लगी रही
ये अजीब सी कशमकश थी
आज जाने क्यूँ यु ही मैंने समेट लिया अपना सामान
और जुटाने लगी यादो को जैसे फिर कभी नही याद आएंगे
अगर इस बार उन्हें सजो कर नही रखा
बंद किया सारी खिडकियों को एक एक करके
कसकर, जिससे बाहर की हवा भीतर की परतो को छू ना पाए
आज जाने क्यूँ यु हिसाब की पन्नो में ढूँढने लगी
उस गुज़रे वक़्त का लेन देन
हिसाब नही मिला कुछ तारीखों का
और इसी झुंझलाहट में पन्नो को फाड़ कर रख दिया किसी गुमनाम कोने में
आज जाने क्यूँ यु ही बस निकल कर बाहर उस चार दिवारी से
मन करने लगा उस गली से गुजरने का जिसमे जाने से अक्सर मना करते है लोग
और गुज़रते हुए उस गली से ये महसूस हुआ मेरी बैचनी कम होने लगी थी ....

Tuesday, November 30, 2010

जवाब


पूछो आज सवाल और मै जवाब दूँगी
जैसे हर बार देती आई हूँ
आज रेशम में लिपटे हुए नही
आज यू मुलायम फूलो की तरह नही
आज थोड़े सच के ज़हर में डूबे
आज थोड़े कडवे कसेले से
आज शायद पसंद नही आयेंगे मेरे जवाब
आज शायद तुम तारीफ़ नही करोगे मेरे शब्दों की
आज नही भाएगी मेरी मुस्कान
आज नही कहोगे 'दोहराहो फिर से '
आज यू फक्र से महफ़िल में मेरा और अपना हमारा कहकर नही बताओगे
आज तो एक अनजान की तरह
फेरोगे मुझसे नज़र
और यू लौटते हुए घर
शायद कह भी दो
तुम बदल गयी हो
और मै कह दूँगी
आज मै नही बदली
बदले है बस जवाब, बस थोड़ी सच की जूठन से

Wednesday, November 24, 2010

फिर मै चल दूंगा


दो घडी सास तो लेने दो
फिर मै चल दूंगा
ज़रा अपनी यादो को यु बाँध लू अपने सामान के साथ
फिर मै चल दूंगा
मेरे नाम की गूँज जो अभी भी किसी कोने में मुझे ढूँढती है
उसका कुछ इंतजाम तो कर लू
फिर मै चल दूंगा
अभी तो शीशे पर बिखरी है मेरी हर सुबह जो ख़ास थी
अभी बाकी है हिसाब उस अजनबी पडोसी से उधार का
अभी तो हटाने हे परदे जो बेमेल से थे मेरी पसंद के
अभी तो ख़त्म करना है इंतज़ार दरवाजे पर किसी का
अभी तो फूल जो सुखाये थे किताबो के बीच ढूँढने है
अभी वोह नमी दीवारों को नए रंग की सुखानी है
ज़रा ये बंदोबस्त तो कर लू
फिर मै चल दूंगा

Saturday, November 13, 2010

तलाशी


मेरे कमरे में बिखरे सामन को देखकर
पहले सोचा होगा तुमने तलाश शुरू करू कहा से
फिर टटोलने लगे होगे अलमारियो को, कुछ पुराने कागजों की तलाश में
मेरे कल की तलाश में
फिर अनमने मन से कुरेदने लगे होंगे दीवारों पर लगी तस्वीरों को
जैसे ढूँढता है कोई चावलों के बीच किसी घुन को
यु एक कमरे से दुसरे कमरे में
कभी फर्श पर कभी छत पर देखा होगा भेद देने वाली नजरो से
फिर आवाज़ दी होगी पड़ोसियों को
पुछा होगा उनसे मेरा हितेषी बन मेरे बारे में
स्वर बदले होंगे फिर धमकी में
जब सम्भावनाये शून्य बनती जा रही होंगी
गुस्से से बंद किया होगा दरवाज़ा जाते वक़्त
बस एक बार पढ़ लिया होता मेरा आखरी ख़त फाड़ने से पहले
तो जवाब मिल जाते खुद और रोज़ यु तलाशी न लेनी पड़ती मेरे कमरे की

मासूमियत




यु मासूमियत से इस बार जब उससे शिकायत की होगी
उसे गुस्से से ज्यादा हसी आयी होगी उसपर
की किस कदर बस शब्दों को बदल दिया उसने
जिसे कभी आँखों की चुभन कहा
अब दिल की चुभन कह कर बात बदल दी

Saturday, November 6, 2010

यू तो


यू तो रास्ता अकेले ही तय करना है
फिर किस रहगुज़र को तलाशती रहती है आंखे
यहाँ तो उस गली से गुज़रना है जहा अपना साया भी सोचता है
साथ देने से पहले
फिर किस आरजू में मुड मुड कर देखती हु
और सोचती हु कोई आवाज़ देगा और कहेगा
अकेले कैसे जाने दू इन सुनसान सी गलियों में
और यू बस बिना कुछ सुने चल दे मेरे साथ
बिन बातो के ही यू ही कट जाये सफ़र
और फिर लगे न जाने कितने बातो को कर चुके हम
और सफ़र लम्बा भी हो तो फिर भी कोई शिकवा न हो
न उससे न खुद से और ना ही मंजिल से
मालूम है मुझे
यू तो रास्ता अकेले ही तय करना है
फिर क्यूँ कदम थम से जाते है जब सुनाई देने लगती है कुछ अनसुनी आहटे

Monday, October 25, 2010

मेरी मौजूदगी


मेरी मौजूदगी यू मेरे अपनों के बीच न ढूढ़
मेरा फ़साना तो अनजान रास्तो में बिखरा पड़ा है
किस किताब को पलटते हो मेरा ज़िक्र लिखा हो जिसमे
मेरा एहसास कुछ पन्नो में कहा सिमट पाया है
मै कोई अनमोल ख्वाब नही जो आँखों में बसा करू
कीमत मेरे वजूद की अभी इतनी भी नही
पर जिस की आँखों में बसेगी ये हकीक़त
उसकी कीमत का कोई हिसाब कहा लगा पाया है
मै ज़माने के खूबसूरत दस्तूर नही
मै तो नाकामयाब से एक वक़्त का हिस्सा हु
मशहूर होने के तेवर नही मुझमे
बस इतनी सी शिकायत है मुझे
मेरे एहसासों को तराजू मै कम मत तौलो
इनके वजन को देखा है बस तुमने
इनकी गहराई को आज तक मापा कहा गया है