Monday, October 25, 2010

मेरी मौजूदगी


मेरी मौजूदगी यू मेरे अपनों के बीच न ढूढ़
मेरा फ़साना तो अनजान रास्तो में बिखरा पड़ा है
किस किताब को पलटते हो मेरा ज़िक्र लिखा हो जिसमे
मेरा एहसास कुछ पन्नो में कहा सिमट पाया है
मै कोई अनमोल ख्वाब नही जो आँखों में बसा करू
कीमत मेरे वजूद की अभी इतनी भी नही
पर जिस की आँखों में बसेगी ये हकीक़त
उसकी कीमत का कोई हिसाब कहा लगा पाया है
मै ज़माने के खूबसूरत दस्तूर नही
मै तो नाकामयाब से एक वक़्त का हिस्सा हु
मशहूर होने के तेवर नही मुझमे
बस इतनी सी शिकायत है मुझे
मेरे एहसासों को तराजू मै कम मत तौलो
इनके वजन को देखा है बस तुमने
इनकी गहराई को आज तक मापा कहा गया है

Tuesday, October 12, 2010

सितारों के बीच


समेट लेती वह बूंद भी उसे
गर उसमे थोड़ी भी गुंजाइश होती बंध जाने की
यू ही वह बिखरी बिखरी सी न रहती
गर उसमे थोड़ी भी हसरत होती
थोड़ी सी भी बस सिमट जाने की
वह अलग थी सबसे या
उसकी दीवानगी को समझने की जरुरत नही समझी ज़माने ने
उससे पूछा जाता उसका ठिकाना
क्या बताती वह
जो हर बार हवा के साथ रुख बदलती थी अपना
वह तलाशती थी अपना वजूद सितारों के बीच आसमा में
और हम उससे कहते रहते थे
क्यूँ नही ढूढ़ पाती वह खुद को किसी भी ज़मी के आशियाने में

Wednesday, September 15, 2010

ज़िक्र मेरा


ज़िक्र मेरा हो जब भी
बस इतना कह देना
वो मौजूद थी यही कही आस पास
मेरे कदमो के निशा न भी हो तो क्या
मुझसे मुलाकात का कोई ज़िक्र करता न भी हो तो क्या
मेरे होने का एहसास कही न कही सासे लेता तो होगा
यही काफी है मेरे लिए
और फिर एक बार अगर
ज़िक्र मेरा हो तो
बस इतना कह देना
वो गुजरी थी कभी शायद किसी सर्द से मौसम में
और धुंध में कोई शायद उसे पहचान भी ना पाया हो

Monday, September 6, 2010

ऐसा लगता है


यू हम भी बिखरे बिखरे से रहते थे
और पता भी नही चला की ज़िन्दगी भी हिस्सों मे बटती चली गयी
हम बेहिसाब इस उम्र को खर्च करते चले गए
और पता भी नहीं चला कब इस उम्र को पास रखने की ख्वाहिश भी चली गयी
कैद खुद को पाते है अब अजीब हालातो मे
और इस कदर बैचैन से हो जाते है
की अब लगता है कि
वह वक़्त भी आया था कभी, जब उड़ने को पंख नए मिल जाते थे
और आज सिर्फ आसमा है सामने
और ना जाने कब ज़मी मे चलना सही लगने लगा
उड़ने की बाते ऐसा लगता है पुरानी कित्ताबो मे कही चली गयी

Sunday, August 29, 2010

कोशिश

तुम हर बार रोक लेते हो मुझे
जब भी मै उस रास्ते पर निकलने लगती हूँ
ये कहकर कि
ये मेरे लिए नही बना
फिर क्यों हौसला बढ़ाते हो
उसका जिसे तुम जानते भी नही
हर बार यही होता आया है
और मैंने हर बार तुम्हारे हिसाब से तय किये है कितने ही अनजान सफ़र
एक बार मुझे समझने की कोशिश करते
तो शायद तुम्हे पता चल जाता
ये रास्ता इस बार मैंने नही चुना
इसने चुना है इस बार मुझे

कभी कभी




कभी कभी जरुरी नही है
शब्दों का वजनदार होना
तुम्हे एहसास दिलाने के लिए
कभी कभी बस ज़रूरी होता है
अधर की हलकी मुस्कराहट
तुम्हे हर अधिकार दिलाने के लिए .....

Saturday, July 24, 2010

Waqt kee aahate

Kabhi thame waqt kee chubhan

Kabhi yu ufffan bharti ye zindagi

Mujhe kuch ehsaas dillati aane waale waqt kee ye aahete nazuk see

Kabhi aakh micholi karti

Kabhi kudh ko dhonte hue khud hee kho jaati

Massoom se baache ke tarah lagne waali

Dheere dheere yu pass aane kee khawahish me

Aane waale waqt kee aahate khilkhilati see

Dhoop me seki se, aur phir bhi chehekti hue

Us raste ke pakdandiyu kee tarah

Tede medi ulajti hue,

Kisi raahghir ke intzaar me jaise humesha se

Naye kadmo kee talash me

Aane waale waqt kee aahate bechain see,

Sawarti hue, jhoomti hue, yu ghata see

Baadal se baat karti hue

Barasne koo tarasti hue

Neele sapno ke jaal se chootkar

Hari chaadar thamna koo

Kabhi halke kabhi garajke barasne ko

Aane waale waqt kee aahate bheegi hue see,

Khamosh see lagne waali

Ek sharmaati hue ladki see

Kabhi darpan me khud ko chupchap niharti see

Sapno me dhoobte uske nayanko see

Aane waale waqt kee ye aahete chor see

Me intzaar me us pal ke

Jaise humesha se

Kab kaidh ho jaaye

Aur mere attit ka hissa ban jaye

Aane waale waqt kee ye aahte apni see……