Saturday, November 13, 2010

तलाशी


मेरे कमरे में बिखरे सामन को देखकर
पहले सोचा होगा तुमने तलाश शुरू करू कहा से
फिर टटोलने लगे होगे अलमारियो को, कुछ पुराने कागजों की तलाश में
मेरे कल की तलाश में
फिर अनमने मन से कुरेदने लगे होंगे दीवारों पर लगी तस्वीरों को
जैसे ढूँढता है कोई चावलों के बीच किसी घुन को
यु एक कमरे से दुसरे कमरे में
कभी फर्श पर कभी छत पर देखा होगा भेद देने वाली नजरो से
फिर आवाज़ दी होगी पड़ोसियों को
पुछा होगा उनसे मेरा हितेषी बन मेरे बारे में
स्वर बदले होंगे फिर धमकी में
जब सम्भावनाये शून्य बनती जा रही होंगी
गुस्से से बंद किया होगा दरवाज़ा जाते वक़्त
बस एक बार पढ़ लिया होता मेरा आखरी ख़त फाड़ने से पहले
तो जवाब मिल जाते खुद और रोज़ यु तलाशी न लेनी पड़ती मेरे कमरे की

मासूमियत




यु मासूमियत से इस बार जब उससे शिकायत की होगी
उसे गुस्से से ज्यादा हसी आयी होगी उसपर
की किस कदर बस शब्दों को बदल दिया उसने
जिसे कभी आँखों की चुभन कहा
अब दिल की चुभन कह कर बात बदल दी

Saturday, November 6, 2010

यू तो


यू तो रास्ता अकेले ही तय करना है
फिर किस रहगुज़र को तलाशती रहती है आंखे
यहाँ तो उस गली से गुज़रना है जहा अपना साया भी सोचता है
साथ देने से पहले
फिर किस आरजू में मुड मुड कर देखती हु
और सोचती हु कोई आवाज़ देगा और कहेगा
अकेले कैसे जाने दू इन सुनसान सी गलियों में
और यू बस बिना कुछ सुने चल दे मेरे साथ
बिन बातो के ही यू ही कट जाये सफ़र
और फिर लगे न जाने कितने बातो को कर चुके हम
और सफ़र लम्बा भी हो तो फिर भी कोई शिकवा न हो
न उससे न खुद से और ना ही मंजिल से
मालूम है मुझे
यू तो रास्ता अकेले ही तय करना है
फिर क्यूँ कदम थम से जाते है जब सुनाई देने लगती है कुछ अनसुनी आहटे

Monday, October 25, 2010

मेरी मौजूदगी


मेरी मौजूदगी यू मेरे अपनों के बीच न ढूढ़
मेरा फ़साना तो अनजान रास्तो में बिखरा पड़ा है
किस किताब को पलटते हो मेरा ज़िक्र लिखा हो जिसमे
मेरा एहसास कुछ पन्नो में कहा सिमट पाया है
मै कोई अनमोल ख्वाब नही जो आँखों में बसा करू
कीमत मेरे वजूद की अभी इतनी भी नही
पर जिस की आँखों में बसेगी ये हकीक़त
उसकी कीमत का कोई हिसाब कहा लगा पाया है
मै ज़माने के खूबसूरत दस्तूर नही
मै तो नाकामयाब से एक वक़्त का हिस्सा हु
मशहूर होने के तेवर नही मुझमे
बस इतनी सी शिकायत है मुझे
मेरे एहसासों को तराजू मै कम मत तौलो
इनके वजन को देखा है बस तुमने
इनकी गहराई को आज तक मापा कहा गया है

Tuesday, October 12, 2010

सितारों के बीच


समेट लेती वह बूंद भी उसे
गर उसमे थोड़ी भी गुंजाइश होती बंध जाने की
यू ही वह बिखरी बिखरी सी न रहती
गर उसमे थोड़ी भी हसरत होती
थोड़ी सी भी बस सिमट जाने की
वह अलग थी सबसे या
उसकी दीवानगी को समझने की जरुरत नही समझी ज़माने ने
उससे पूछा जाता उसका ठिकाना
क्या बताती वह
जो हर बार हवा के साथ रुख बदलती थी अपना
वह तलाशती थी अपना वजूद सितारों के बीच आसमा में
और हम उससे कहते रहते थे
क्यूँ नही ढूढ़ पाती वह खुद को किसी भी ज़मी के आशियाने में

Wednesday, September 15, 2010

ज़िक्र मेरा


ज़िक्र मेरा हो जब भी
बस इतना कह देना
वो मौजूद थी यही कही आस पास
मेरे कदमो के निशा न भी हो तो क्या
मुझसे मुलाकात का कोई ज़िक्र करता न भी हो तो क्या
मेरे होने का एहसास कही न कही सासे लेता तो होगा
यही काफी है मेरे लिए
और फिर एक बार अगर
ज़िक्र मेरा हो तो
बस इतना कह देना
वो गुजरी थी कभी शायद किसी सर्द से मौसम में
और धुंध में कोई शायद उसे पहचान भी ना पाया हो

Monday, September 6, 2010

ऐसा लगता है


यू हम भी बिखरे बिखरे से रहते थे
और पता भी नही चला की ज़िन्दगी भी हिस्सों मे बटती चली गयी
हम बेहिसाब इस उम्र को खर्च करते चले गए
और पता भी नहीं चला कब इस उम्र को पास रखने की ख्वाहिश भी चली गयी
कैद खुद को पाते है अब अजीब हालातो मे
और इस कदर बैचैन से हो जाते है
की अब लगता है कि
वह वक़्त भी आया था कभी, जब उड़ने को पंख नए मिल जाते थे
और आज सिर्फ आसमा है सामने
और ना जाने कब ज़मी मे चलना सही लगने लगा
उड़ने की बाते ऐसा लगता है पुरानी कित्ताबो मे कही चली गयी