Wednesday, March 13, 2013

Kyu aaj


Kyu aaj phir yeh ehsaas hua
Mai tanha tha aur tanha reh gya
Uske shokh khwabo me siskana chod diya tha
aaj palke bhi nam hai naa jane kiska maatam hai
chune hue phool mere guldaste kii raunak the
usi  mez par sapno ko bhi rakh choda tha
mallom uski keemat tab na thee
who pholo ka mausam tha, use beete arsaa hua
Kyu aaj phir yeh ehsaas hua
Mai tanha tha aur tanha reh gya
Jhote waayde na jaane kis chandi ke warq se saajaye the
Woh chamakte bhi the aur beswad bhi
Kisi roshandaan se chupkar jo dekha humne
Woh jashn  me hum sirf mehmaan the, use jeete arsaa hua
Bojh dil pe jo rakhte to tumse keh na paate
Hum pigalte hai jaise mom kii koi gudiya
Banane me sadiya lagi fanna pal me ho gaye
Hum sajhte the kisi deewar par banke beshkeemati tasveer
Bazaar me utare to jaan gaye
Apna bhi koi mol bhav kare, aisa koi hai to kaha hai
Use mile arsaa hua

Monday, March 12, 2012

मिल जाते जो तुम उन दिनों

मिल जाते जो तुम उन दिनों
जब मै अपने पहलू में चाँद रखती थी
और सितारों को अपनी जुल्फों में सजाकर रखती थी
सोचो , प्यार अपना किसी सुहानी रात सा होता

मिल जाते जो तुम उन दिनों
जब में इतराकर हवा को कहती थी
तू चल किसी भी और, मेरा ठौर वही बन जायेगा
मेरे हाथो की लकीरे भी बातें करती थी मुझसे
सोचो , प्यार अपना किसी कहानी सा होता

तकदीर तो देखो मिले तो अब मिले जब
मैंने जान लिया जिंदगी ख्वाबो में नही जी जाती........................

Wednesday, July 6, 2011

सोचा है


मेरी नाराज़गी महज़ रूठने मनाने के लिए नही
ये तो मेरी ज़िन्दगी का अंदाज़ बाया करती है
कभी रुसवा ज़माना करता है कभी अपने किया करते है ...
सोचा है इस बार उस पुराने से संदूक में बंद कर लू
अपने ख्वाबो को, की ये उड़ न पाए
बहुत घायल से हो चुके है जब भी उड़ान भरी है दूसरो के आसमानों में...
मेरा ज़िक्र जब भी होता है, तमाशा अपने आप ही बन जाता है
बहुत लोग है ज़माने में, जिन्हें हसने का और कोई बहाना नही मिलता
सोचा है इस बार से मिलना भी छोड़ दू लोगो से
शायद मेरे नाम सा कोई आयर शख्स मिल जाये उन्हें..
ये गुज़र तो रही है धीमी धीमी रफ़्तार से ज़िन्दगी
सोचा है इस बार सासों के हिसाब में उलट फेर कर दू...

Saturday, April 2, 2011

मुझे रहने दो


मुझे रहने दो गुमनामी में
ये अँधेरे कभी उस उजाले से ज्यादा भाते है
जो उजाले साथ में लाते है शर्त , जागते रहने की....

मुझे खफा रहने दो
मनाने के झूठे बहानो से
ये टूटती उम्मीदों के सिलसिलो को बढ़ाते है....

किसको फ़िक्र है यहाँ जश्न की
हम तो हर नाकामयाबी में समझा लेते है
कुछ तो है जो सिर्फ अपना है
जिसे बाटना नही पड़ता,,,,,,

बदल रही है आरजू वक़्त के साथ
कभी जिद थी मुस्कुराने की
और आज जिद है महज़ जीने की .....

Saturday, January 15, 2011

कह देना


आज रौशनी से कह देना
की थोड़ी धीमी आँच में सिक कर आये,
जम चुके है मेरे एहसास बर्फ से
और आँखे ढूंढ रही है उस तपिश को,

कब का बंद हो चुका है वह सुराख़
जहाँ से टटोलती थी एक जोड़ीदार आंखे,
मेरी साँसों की हलचल को ,
उन आँखों से इतना कह देना
नए सुराख़ का कोई तो इंतजाम कर लें

बुलाया तो आज भी है
किसी ने जश्न में अपने
बस थोड़ी सी उलझन है
आज रंगत नही उस लिफाफे में पहली जैसे
और नाम मेरा जैसे जल्दबाजी में लिखा है

मिले वह लोग तो इतना कह देना
न बुलाओगे तो भी इससे बेहतर होगा
मुझे अब भीड़ से डर लगने लगा है

Tuesday, January 4, 2011

नाम


तुम मुझे दो कुछ नाम और
देखो मै वही बन जाऊंगी
ख्वाब कहोगे तो तुम्हारी पलकों की
थिरकन पर बिखरूंगी सवरूंगी
थोडा इतराते हुए और मुस्कुराते हुए
चुपचाप तुम्हारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन ही जाऊंगी
और जो कह दोंगे मुझे
मै कोई हकीक़त कडवी सी,
तो भी क्या
बस यू ही एक अनजान की तरह
छोड़ जाऊंगी तुमको,
वही से जहा से तुम इशारा कर दोगे जाने का
ग़ज़ल गीत जो कह दोगे
तो शब्दों को अपने आगोश में यू ले लुंगी
जो मेरी शक्शियत का आईना बन जाए और
गुनगुनाते रहे तुम्हारे लब जिन्हें हमेशा
और जो कुछ नाम न भी दोगे तो कोई शिकायत नही
मुझे पता है ये
नाम उन्हें दिए जाते है जिन्हें किसी एक शब्द में तराशा जा सके
मैंने तो हर पल में बदला है अपना मिजाज़ तुम्हारे लिए

Thursday, December 30, 2010

आज जाने क्यूँ


आज जाने क्यूँ नमी कुछ ज्यादा सी लगी आँखों की समंदर में
क्यूँ आज भीगी भीगी पलके दिन भर बारिश का सा एहसास दिलाती रही
और यु ही धीमी मुस्कराहट खुद को समटने की कोशिश में लगी रही
ये अजीब सी कशमकश थी
आज जाने क्यूँ यु ही मैंने समेट लिया अपना सामान
और जुटाने लगी यादो को जैसे फिर कभी नही याद आएंगे
अगर इस बार उन्हें सजो कर नही रखा
बंद किया सारी खिडकियों को एक एक करके
कसकर, जिससे बाहर की हवा भीतर की परतो को छू ना पाए
आज जाने क्यूँ यु हिसाब की पन्नो में ढूँढने लगी
उस गुज़रे वक़्त का लेन देन
हिसाब नही मिला कुछ तारीखों का
और इसी झुंझलाहट में पन्नो को फाड़ कर रख दिया किसी गुमनाम कोने में
आज जाने क्यूँ यु ही बस निकल कर बाहर उस चार दिवारी से
मन करने लगा उस गली से गुजरने का जिसमे जाने से अक्सर मना करते है लोग
और गुज़रते हुए उस गली से ये महसूस हुआ मेरी बैचनी कम होने लगी थी ....